Sunday, December 2, 2007

कोश, समांतर कोश और अनुवाद...3


शब्द संकलन
शब्दों के संकलन और कोश निर्माण की बात करें तो—


सभ्यता और संस्कृति के उदय से ही आदमी जान गया था कि भाव के सही संप्रेषण के लिए सही अभिव्यक्ति आवश्यक है. सही अभिव्यक्ति के लिए सही शब्द का चयन आवश्यक है. सही शब्द के चयन के लिए शब्दों के संकलन आवश्यक हैं. शब्दों और भाषा के मानकीकरण की आवश्यकता समझ कर आरंभिक लिपियों के उदय से बहुत पहले ही आदमी ने शब्दों का लेखाजोखा रखना शुरू कर दिया था. इस के लिए उस ने कोश बनाना शुरू किया. कोश मेंबने. हमारी यह शानदार परंपरा वेदों जितनी—कम से कम पाँच हज़ार साल—पुरानी है. प्रजापति कश्यप का निघंटु संसार का प्राचीनतम शब्द संकलन है. इस में 18 सौ वैदिक शब्दों को इकट्ठा किया गया है. निघंटु पर महर्षि यास्क की व्याख्या निरुक्त संसार का पहला शब्दार्थ कोश और विश्वकोश यानी ऐनसाइक्लोपीडिया है! इस महान शृंखला की सशक्त कड़ी है छठी या सातवीं सदी में लिखा अमर सिंह कृत नामलिंगानुशासन या त्रिकांड जिसे सारा संसार अमर कोश के नाम से जानता है.

भारत के बाहर संसार में शब्द संकलन का एक प्राचीन प्रयास अक्कादियाई संस्कृति की शब्द सूची है. यह शायद ईसा पूर्व सातवीं सदी की रचना है. ईसा से तीसरी सदी पहले की चीनी भाषा का कोश है ईर्या.

आधुनिक कोशों की नीवँ डाली इंग्लैंड में 1755 में सैमुएल जानसन ने. उन की डिक्शनरी आफ़ इंग्लिश लैंग्वेज (Samuel Johnson's Dictionary of the English Language) ने कोशकारिता को नए आयाम दिए. इस में परिभाषाएँ भी दी गई थीं.

असली आधुनिक कोश आया इक्यावन साल बाद 1806. अमरीका में नोहा वैब्स्टर की ए कंपैंडियस डिक्शनरी आफ़ इंग्लिश लैंग्वेज (Noah Webster's A Compendious Dictionary of the English Language) प्रकाशित हुई. इस ने जो स्तर स्थापित किया वह पहले कभी नहीं हुआ था. साहित्यिक शब्दावली के साथ साथ कला और विज्ञान क्षेत्रों को स्थान दिया गया था. कोश को सफल होना ही था, हुआ. वैब्स्टर के बाद अँगरेजी कोशों के रिवीज़न और नए कोशों के प्रकाशन का व्यवसाय तेज़ी से बढ़ने लगा. आज छोटे बड़े हर शहर में, विदेशों में तो हर गाँव में, किताबों की दुकानें हैं. हर दुकान पर कई कोश मिलते हैं. हर साल कोशों में नए शब्द शामिल किए जाते हैं.

अपने कोशों के लिए वैब्स्टर ने 20 भाषाएँ सीखीं ताकि वह अँगरेजी शब्दों के उद्गम तक जा सकें. आप को जान कर आश्चर्य होगा और प्रसन्नता भी कि उन भाषाओं में एक संस्कृत भी थी. तभी उस कोश में अनेक अँगरेजी शब्दों का संस्कृत उद्गम तक वर्णित है. मैं पिछले तीस सालों से वैब्स्टर कोश का न्यू कालिजिएट संस्करण काम में ला रहा हूँ. मुझे इस में मेरे काम की हर ज़रूरी सामग्री मिल जाती है. यहाँ तक कि भारोपीय मूल वाले अँगरेजी शब्दों के संस्कृत स्रोत भी. समांतर कोश के द्विभाषी संस्करण द पेंगुइन इग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी पर काम करते करते कई बार तो अनपेक्षित जगहों पर भी शब्दों के संस्कृत मूल मिल गए. पता चला कि ईक्विवैलेंट, बाईवैलेंट जैसे शब्दों के मूल में है संस्कृत का वलयन. एअर यानी हवा का मूल संस्कृत ईर में है, सोनिक के मूल में हैं संस्कृत के स्वन और स्वानिक. कई बार मैं सोचता था—काश, डाक्टर रघुवीर की टीम ने और बाद में तकनीकी शब्दावली बनाने वाले सरकारी संस्थानों ने ये संस्कृत मूल जानने की कोशिश की होती! उन के बनाए शब्दों को एक भारतीय आधार मिल जाता और लोकप्रियता सहज हो जाती. ख़ैर, उन लोगों ने जो किया वह भी भागीरथ प्रयास था...

कोश कई तरह के होते हैं. किसी भाषा के एकल कोश, जैसे ऊपर लिखे अँगरेजी कोश या हिंदी से हिंदी के कोश. इन में एक भाषा के शब्दों के अर्थ उसी भाषा में समझाए जाते हैं. कोश द्विभाषी भी होते हैं. जैसे संस्कृत से अँगरेजी के कोश. सन 1872 में छपी सर मोनिअर मोनिअर-विलियम्स की (बारीक़ टाइप में 8.5"x11.75" आकार के तीन कालम वाले एक हज़ार तीन सौ तैंतीस पृष्ठों की अद्वितीय संस्कृत-इंग्लिश डिक्शनरी इस का अनुपम उदाहरण है. या आजकल बाज़ार में मिलने वाले ढेर सारे अँगेरेजी-हिंदी कोश और हिंदी-अँगरेजी कोश. इन का उद्देश्य होता है एक भाषा जानने वाले को दूसरी भाषा के शब्दों का ज्ञान देना. जिस को जिस भाषा में पारंगत होना होता है या उस के शब्दों को समझने की ज़रूरत होती है, वह उसी भाषा के कोशों का उपयोग करता है.


कोशों के पीछे सामाजिक और राजनीतिक उद्देश्य भी होते हैं.

मोनिअर-विलियम्स के ज़माने में अँगरेज भारत पर राज करने के लिए हमारी संस्कृति और भाषाओं को पूरी तरह समझना चाहते थे, इस लिए उन्हों ने ऐसे कई कोश बनवाए. आज हम अँगरेजी सीख कर सारे संसार का ज्ञान पाना चाहते हैं तो हम अँगरेजी से हिंदी के कोश बना रहे हैं. हमारे समांतर कोश और उस के बाद के हमारे ही अन्य कोश भी हमारे दैश की इसी इच्छा आकांक्षा के प्रतीक हैं, प्रयास हैं.

(क्रमशः)

कोश, समांतर कोश और अनुवाद... 1

हाल ही मैं ने भारतीय अनुवाद परिषद की डा. गार्गी गुप्त व्याख्यान माला के अंतर्गत तीसरा व्याख्यान दिया. उस का पूरा (अविकल) मूल मैं यहाँ नीचे दे रहा हूँ. साथ ही उस के अंत में संलग्न हैं द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी के बारे में आधारिक जानकारी, हमारी पुस्तकों की सूची, तथा कुछ चित्र.

आप सब से निवेदन है कि इस पूरा पढ़ें, मित्रों को यह लिंक भेजें. चाहे तो कापी कर के अपने कंप्यूटर पर स्वतंत्र फ़ाइल के रूम में सेव कर लें.

साभार.

अरविंद कुमार

उस अवसर पर सब से पहले डाक्टर पूरण चंद्र टंडन ने परिषद का परिचय दिया, परिषद की ओर से श्रीमती कुसुम को और मुझे पुष्पगुच्छ औऱ मुजे स्मृति चिह्न दिए गए.

बाद में डाक्टर विजय कुमार मल्होत्रा ने मेरे तथा हमारे नए कोश द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी के बारे में जानकारी दी. फिर मैं ने व्याख्यान दिया.

भारतीय अनुवाद परिषद

डा. गार्गी गुप्त स्मृति व्याख्यानमाला: 3

इंडिया इंटरनेशनल सैंटर, नई दिल्ली, 27 नवंबर 2007

अरविंद कुमार

कोश, समांतर कोश और अनुवाद...

सब से पहले मैं अपने घनिष्ठ मित्र दंपति सुलेख और गार्गी को याद करना चाहता हूँ. सुलेख चंद गुप्ता प्रसिद्ध अर्थशास्त्री थे, दसियों साल विदेशों में रह कर भी किसी भी प्रकार के अहंकार से हीन पूरी तरह भारतीय और आम आदमी के हितों के समर्थक रहे. उन के जैसे पढ़ाकू मैं ने कम देखे हैं. गार्गी गुप्ता विदुषी थीं, उत्साही थीं, बहुभाषाविद थीं, और हिंदी में अनुवाद आंदोलन की नेता थीं. वह भारतीय अनुवाद परिषद की जान थीं. उन का सोचना विचारना, रहना ओढ़ना बिछोना अनुवाद ही था. उन की देखरेख में भारतीय अनुवाद परिषद संसार की प्रमुख संस्थाओं में बनी. मेरे लिए यह हर्ष की बात है कि गार्गी और सुलेख के जाने के बाद परिषद को उन की उत्साही पुत्रवधु नीता गुप्ता का पूरा समर्थन मिल रहा है. डाक्टर पूरणचंद टंडन और श्रीमती संतोष वर्मा कई वर्षों से इस की बाग़डोर सँभाले हैं.

आगे बढ़ने से पहले मैं भारतीय अनुवाद परिषद को धन्यवाद देता हूँ कि गार्गी की याद में यह व्याख्यान माला स्थापित की और जारी रखी है. मेरे लिए यह हर्ष और गौरव का विषय है कि इस बार मुझे यहाँ बोलने का सुअवसर दिया है.

मुझे विषय दिया गया है-कोश, समांतर कोश और अनुवाद...

शब्द और भाषा...

मैं बात शुरू करता हूँ शब्द से, भाषा से. किस प्रकार शब्द और भाषा सामाजिक उपकरण हैं और किस तरह अनुवाद भाषाओं और संस्कृतियों के बीच संगम का काम करता है. मानव को आगे बढ़ाता है. मैं अनुवाद में मेरे सामने आने वाली कठिनाइयों की बात भी मैं करूँगा...

कहते हैं कि बृहस्पति जैसा गुरु पा कर भी देवराज इंद्र हज़ारों वर्ष तक शब्द की थाह नहीं पा सके. फिर कहाँ देवगुरु बृहस्पति और कहाँ मैं अज्ञानी! आप जैसे ज्ञानियों के बीच मैं आधा ज्ञानी हूँ. मुझ जैसे लोगों का ज्ञान संस्कृत में चंचु प्रवेश कहा जाता है. इधर उधर चोंच घुसा कर जो पाया, उसी को ज्ञान समझ लेना. जो कुछ भी मैं ने पिछले तीस बत्तीस बरसों से शब्दों को संकलित करते करते इधर उधर चोंच मार कर, पढ़ कर, सीखा है, वही मैं अपने शब्दों में कहने की आधी अधूरी कोशिश कर रहा हूँ...

हम शब्दों का, शब्दों के माध्यम से वाक्यों का अनुवाद करते हैं. जो स्रोत भाषा मे किसी ने लिखा है वह हम अपने पाठ को लक्ष्य भाषा में बताते हैं. अनुवाद में भाषा और शब्द सर्वोपरि हैं.

अनुवाद भाषाओं के परस्पर वार्तालाप का दूसरा नाम है. अनुवाद भाषाओं और संस्कृतियों के बीच संगम का काम करता है. मानव को आगे बढ़ाता है. अनुवाद से संस्कृतियाँ समृद्ध होती है. मानव एक सूत्र में बँधते जाते हैं.

शब्द भाषा की सर्वाधिक महत्वपूर्ण और अपरिहार्य कड़ी है. हमारे संदर्भ में शब्द का केवल एक अर्थ है... एकल, स्वतंत्र, सार्थक ध्वनि. वह ध्वनि जो एक से दूसरे तक मनोभाव पहुँचाती है. संसार की सभी संस्कृतियों में इस सार्थक ध्वनि को भारी महत्व दिया गया है. संस्कृत ने शब्द को ब्रह्म का दर्जा दिया था. शब्द जो स्वयं ईश्वर के बराबर है, जो फैलता है, विश्व को व्याप लेता है. ग्रीक और लैटिन सभ्यताओं में शब्द की, लोगोस logos की, महिमा का गुणगान विस्तार से है. ईसाइयत में शब्द या लोगोस को कारयित्री प्रतिभा (क्रीएटिव जीनियस creative genius) माना गया है. कहा गया है कि यह ईसा मसीह में परिलक्षित ईश्वर की रचनात्मकता ही है.

कारण यह कि भाषा आज के मानव, हम मनु मानव या होमो सैपिएंस, के मन मस्तिष्क का, यहाँ तक कि अस्तित्व का, अंतरंग अंग हैभाषा सीखने की क्षमता, भाषा के द्वारा कुछ कहने की शक्ति. इस शक्ति के उदय ने ही मानव को संगठन की सहज सुलभ क्षमता प्रदान की और आदमी को प्रकृति पर राज्य कर पाने में सक्षम बनाया. इसी के दम पर सारा ज्ञान और विज्ञान पनपा है. शब्दों और वाक्यों से बनी भाषा के बिना समाज का व्यापार नहीं चल सकता. आदमी अनपढ़ हो, विद्वान हो, वक्ता हो, लेखक हो, बच्चा हो, बूढ़ा हो... कुछ कहना है तो उसे शब्द चाहिए, भाषा चाहिए. वह बड़बड़ाता भी है तो शब्दों में, भाषा में. गूँगे लोग अपंग माने जाते हैं. धरती के बाहर अगर कभी कोई बुद्धियुक्त जीव जाति पाई गई, तो मुझे पूरा विश्वास है कि उस में संप्रेषण का रूप कोई भी हो, उस के मूल में किसी न किसी प्रकार की व्याकृता भाषा ज़रूर होगी और शब्द ज़रूर होगा.

शब्द के बिना भाषा की कल्पना करना निरर्थक है. शब्द हमारे मन के अमूर्त्त भाव, इच्छा, आदेश, कल्पना का वाचिक प्रतीक, ध्वन्यात्मक प्रतीक है. शब्द जब मौखिक था, तो मात्र हवा था. उस का अस्तित्व क्षणिक था. वह क्षणभंगुर था. लिखित हो कर वह छवि बन गया, चित्र बन गया, मूर्ति बन गया.दूसरों से कुछ कहने का माध्यम, भाव के संप्रेषण का वाचिक साधन. शब्द का मूल अर्थ है ध्वनि. शब्द जब मौखिक था, तो मात्र हवा था. उस का अस्तित्व क्षणिक था. वह क्षणभंगुर था. शब्द को लंबा जीवन देने के लिए कंठस्थ कर के, याद कर के, वेदों को अमर रखने की कोशिश की गई थी. वेदों को कंठस्थ करने वाले वेदी, द्विवेदी, त्रिवेदी और चतुर्वेदी ब्राह्मणों की पूरी जातियाँ बन गईं जो अपना अपना वेद पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखती थीं. इसी प्रकार क़ुरान को याद रखने वाले हाफ़िज कहलाते थे.

शब्द को याददाश्त की सीमाओं से बाहर निकाल कर सर्वव्यापक करने के लिए, लंबा जीवन देने के लिए, लिपियाँ बनीं. लिपियों में अंकित हो कर शब्द साकार मूर्ति बन गया. वह ताड़पत्रों पर, पत्थरों पर, अंकित किया जाने लगा. काग़ज़ आया तो शब्द लिखना और भी आसान, सस्ता हो कर टिकाऊ हो गया. लिपि ने शब्द को स्थायित्व दिया. काल और देश की सीमाओं से बाहर निकल कर व्यापक हो गया. अब वह एक से दूसरे देश और एक से दूसरी पीढ़ी तक आसानी से जा सकता था. मुद्रण कला के आविष्कार से मानव के ज्ञान में विस्तार के महाद्वार खुल गए. और अब इंटरनैट सूचना का महापथ और ज्ञान विज्ञान का अप्रतिम भंडार बन गया है. बिजली की गति से हम अपनी बात सात समंदर पार तत्काल पहुँचाते हैं.

हमारा संबंध केवल वाचिक और लिखित शब्द मात्र से हैलिपि कोई भी हो, भाषा कोई भी हो, हिंदी हो, अँगरेजी हो, या चीनी... एक लिपि में कई भाषाएँ लिखी जा सकती हैं, जैसे देवनागरी में हिंदी और मराठी, और नेपाली... हिंदी के लिए मुंडी जैसी पुरानी कई लिपियाँ थीं... हिंदी के कई काव्य ग्रंथ उर्दू लिपि में लिखे गए. आज उर्दू कविताएँ देवनागरी में छपती और ख़ूब बिकती हैं. रोमन लिपि में यूरोप की अधिकांश भाषाएँ लिखी जाती हैं. रोमन में हिंदी भी लिखी जाती है. ब्रिटिश काल में सैनिकों को रोमन हिंदी सिखाई जाती थी. आज इंटरनैट पर कई लोग हिंदी पत्रव्यवहार रोमन लिपि में ही करते हैं. रोमन में आजकल संसार की कई अन्य भाषाएँ लिखने के कई विकल्प मिलते हैं...

चीनी जापानी या प्राचीन मिस्री भाषाएँ चित्रों में लिखी जाती हैं. चित्रों में लिखी लिपि का आधुनिकतम रूप शार्टहैंड कहा जा सकता है. चित्र लिपियो में अक्षरों का होना आवश्यक नहीं है. हाँ, जो बात सब भाषाओं और लिपियों में कामन है, एक सी है, समान है, वह है शब्द. हर भाषा शब्दों में बात करती है. शब्द लिखती. सुनती और पढ़ती है.

हर भाषा का अपना एक कोड होता है. इसी लिए संस्कृत में भाषा को व्याकृता वाणी कहा गया है, नियमों से बनी और नियमों से बँधी सुव्यवस्थित क्रमबद्ध बोली. शुरू में यह कोड लिखा नहीं गया था. सब मन ही मन यह कोड जानते थे. पढ़ें या नहीं फिर भी हम सब यह कोड जानते हैं. यह कोड किसी भी समाज के सदस्यों के बीच एक तरह का अलिखित अनुबंध है. लिखना पढ़ना सीखने से पहले बच्चा यह कोड समझ चुका होता है.

भाषा और कोड निरंतर नवीकरण की प्रक्रिया में रहते है...

पहले आम आदमी भाषा बनाता है, बाद में विद्वान मग़ज़ खपा कर उस के कोड बनाते हैं. फिर आम आदमी उन कोडों को तोड़ता हुआ नए शब्द बनाता रहता है, शब्दों का रूप और अर्थ बदलता रहता है. कोडों की सीमाएँ लाँघती, बाढ़ में आई नदी की तरह किनारे तोड़ती भाषाएँ नई धाराएँ बना लेती हैं. पहले विद्वान माथा पीटते हैं, इस प्रवृत्ति को उच्छृंखलता कहते हैं, भाषा का पतन कहते हैं, फिर बाद में नए कोड बनाने में जुट जाते हैं...

भाषाओं को विकारों से बचाने के लिए विद्वान व्याकरण बनाते हैं, शब्दकोश बनाते हैं. जानसन और वैब्स्टर जैसे कोशकारों ने लिखा है कि उन का उद्देश्य था इंग्लिश और अमरीकन इंग्लिश को स्थायी रूप देना, उसे बिगड़ने से बचाना. उन के कोश आधुनिक संसार के मानक कोश बने. लेकिन हुआ क्या? उन के देखते देखते भाषा बदल गई, नए शब्द आ गए. फिर कोशों के नए संस्करण बनने लगे. आजकल अँगरेजी के कोशों में हर साल हज़ारों नए शब्द डाले जाते हैं.

यही तो जीवित भाषाओं का गुण है... ख़ुशी की बात है कि हमारी हिंदी भी नए शब्द बनाने और ज़रूरी शब्द बाहर से लेने में किसी से पीछे नहीं रही है. अंतर केवल इतना है कि हमारे यहाँ अभी तक कोशों में नए शब्द हर साल डालने के प्रथा नहीं चली है.

(क्रमशः)

कोश, समांतर कोश और अनुवाद...- 1

हाल ही मैं ने भारतीय अनुवाद परिषद की डा. गार्गी गुप्त व्याख्यान माला के अंतर्गत तीसरा व्याख्यान दिया. उस का पूरा (अविकल) मूल मैं यहाँ नीचे दे रहा हूँ. साथ ही उस के अंत में संलग्न हैं द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी के बारे में आधारिक जानकारी, हमारी पुस्तकों की सूची, तथा कुछ चित्र.

आप सब से निवेदन है कि इस पूरा पढ़ें, मित्रों को यह लिंक भेजें. चाहे तो कापी कर के अपने कंप्यूटर पर स्वतंत्र फ़ाइल के रूम में सेव कर लें.

साभार.

अरविंद कुमार

उस अवसर पर सब से पहले डाक्टर पूरण चंद्र टंडन ने परिषद का परिचय दिया, परिषद की ओर से श्रीमती कुसुम को और मुझे पुष्पगुच्छ औऱ मुजे स्मृति चिह्न दिए गए.

बाद में डाक्टर विजय कुमार मल्होत्रा ने मेरे तथा हमारे नए कोश द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी के बारे में जानकारी दी. फिर मैं ने व्याख्यान दिया.

भारतीय अनुवाद परिषद की ओर से श्री चारु गुप्त अरविंद कुमार को स्मृति चिह्न भेंट कर रहे हैं.

भारतीय अनुवाद परिषद

डा. गार्गी गुप्त स्मृति व्याख्यानमाला: 3

इंडिया इंटरनेशनल सैंटर, नई दिल्ली, 27 नवंबर 2007

अरविंद कुमार

कोश, समांतर कोश और अनुवाद...

सब से पहले मैं अपने घनिष्ठ मित्र दंपति सुलेख और गार्गी को याद करना चाहता हूँ. सुलेख चंद गुप्ता प्रसिद्ध अर्थशास्त्री थे, दसियों साल विदेशों में रह कर भी किसी भी प्रकार के अहंकार से हीन पूरी तरह भारतीय और आम आदमी के हितों के समर्थक रहे. उन के जैसे पढ़ाकू मैं ने कम देखे हैं. गार्गी गुप्ता विदुषी थीं, उत्साही थीं, बहुभाषाविद थीं, और हिंदी में अनुवाद आंदोलन की नेता थीं. वह भारतीय अनुवाद परिषद की जान थीं. उन का सोचना विचारना, रहना ओढ़ना बिछोना अनुवाद ही था. उन की देखरेख में भारतीय अनुवाद परिषद संसार की प्रमुख संस्थाओं में बनी. मेरे लिए यह हर्ष की बात है कि गार्गी और सुलेख के जाने के बाद परिषद को उन की उत्साही पुत्रवधु नीता गुप्ता का पूरा समर्थन मिल रहा है. डाक्टर पूरणचंद टंडन और श्रीमती संतोष वर्मा कई वर्षों से इस की बाग़डोर सँभाले हैं.

आगे बढ़ने से पहले मैं भारतीय अनुवाद परिषद को धन्यवाद देता हूँ कि गार्गी की याद में यह व्याख्यान माला स्थापित की और जारी रखी है. मेरे लिए यह हर्ष और गौरव का विषय है कि इस बार मुझे यहाँ बोलने का सुअवसर दिया है.

मुझे विषय दिया गया है-कोश, समांतर कोश और अनुवाद...

शब्द और भाषा...

मैं बात शुरू करता हूँ शब्द से, भाषा से. किस प्रकार शब्द और भाषा सामाजिक उपकरण हैं और किस तरह अनुवाद भाषाओं और संस्कृतियों के बीच संगम का काम करता है. मानव को आगे बढ़ाता है. मैं अनुवाद में मेरे सामने आने वाली कठिनाइयों की बात भी मैं करूँगा...

कहते हैं कि बृहस्पति जैसा गुरु पा कर भी देवराज इंद्र हज़ारों वर्ष तक शब्द की थाह नहीं पा सके. फिर कहाँ देवगुरु बृहस्पति और कहाँ मैं अज्ञानी! आप जैसे ज्ञानियों के बीच मैं आधा ज्ञानी हूँ. मुझ जैसे लोगों का ज्ञान संस्कृत में चंचु प्रवेश कहा जाता है. इधर उधर चोंच घुसा कर जो पाया, उसी को ज्ञान समझ लेना. जो कुछ भी मैं ने पिछले तीस बत्तीस बरसों से शब्दों को संकलित करते करते इधर उधर चोंच मार कर, पढ़ कर, सीखा है, वही मैं अपने शब्दों में कहने की आधी अधूरी कोशिश कर रहा हूँ...

हम शब्दों का, शब्दों के माध्यम से वाक्यों का अनुवाद करते हैं. जो स्रोत भाषा मे किसी ने लिखा है वह हम अपने पाठ को लक्ष्य भाषा में बताते हैं. अनुवाद में भाषा और शब्द सर्वोपरि हैं.

अनुवाद भाषाओं के परस्पर वार्तालाप का दूसरा नाम है. अनुवाद भाषाओं और संस्कृतियों के बीच संगम का काम करता है. मानव को आगे बढ़ाता है. अनुवाद से संस्कृतियाँ समृद्ध होती है. मानव एक सूत्र में बँधते जाते हैं.

शब्द भाषा की सर्वाधिक महत्वपूर्ण और अपरिहार्य कड़ी है. हमारे संदर्भ में शब्द का केवल एक अर्थ है... एकल, स्वतंत्र, सार्थक ध्वनि. वह ध्वनि जो एक से दूसरे तक मनोभाव पहुँचाती है. संसार की सभी संस्कृतियों में इस सार्थक ध्वनि को भारी महत्व दिया गया है. संस्कृत ने शब्द को ब्रह्म का दर्जा दिया था. शब्द जो स्वयं ईश्वर के बराबर है, जो फैलता है, विश्व को व्याप लेता है. ग्रीक और लैटिन सभ्यताओं में शब्द की, लोगोस logos की, महिमा का गुणगान विस्तार से है. ईसाइयत में शब्द या लोगोस को कारयित्री प्रतिभा (क्रीएटिव जीनियस creative genius) माना गया है. कहा गया है कि यह ईसा मसीह में परिलक्षित ईश्वर की रचनात्मकता ही है.

कारण यह कि भाषा आज के मानव, हम मनु मानव या होमो सैपिएंस, के मन मस्तिष्क का, यहाँ तक कि अस्तित्व का, अंतरंग अंग हैभाषा सीखने की क्षमता, भाषा के द्वारा कुछ कहने की शक्ति. इस शक्ति के उदय ने ही मानव को संगठन की सहज सुलभ क्षमता प्रदान की और आदमी को प्रकृति पर राज्य कर पाने में सक्षम बनाया. इसी के दम पर सारा ज्ञान और विज्ञान पनपा है. शब्दों और वाक्यों से बनी भाषा के बिना समाज का व्यापार नहीं चल सकता. आदमी अनपढ़ हो, विद्वान हो, वक्ता हो, लेखक हो, बच्चा हो, बूढ़ा हो... कुछ कहना है तो उसे शब्द चाहिए, भाषा चाहिए. वह बड़बड़ाता भी है तो शब्दों में, भाषा में. गूँगे लोग अपंग माने जाते हैं. धरती के बाहर अगर कभी कोई बुद्धियुक्त जीव जाति पाई गई, तो मुझे पूरा विश्वास है कि उस में संप्रेषण का रूप कोई भी हो, उस के मूल में किसी न किसी प्रकार की व्याकृता भाषा ज़रूर होगी और शब्द ज़रूर होगा.

शब्द के बिना भाषा की कल्पना करना निरर्थक है. शब्द हमारे मन के अमूर्त्त भाव, इच्छा, आदेश, कल्पना का वाचिक प्रतीक, ध्वन्यात्मक प्रतीक है. शब्द जब मौखिक था, तो मात्र हवा था. उस का अस्तित्व क्षणिक था. वह क्षणभंगुर था. लिखित हो कर वह छवि बन गया, चित्र बन गया, मूर्ति बन गया.दूसरों से कुछ कहने का माध्यम, भाव के संप्रेषण का वाचिक साधन. शब्द का मूल अर्थ है ध्वनि. शब्द जब मौखिक था, तो मात्र हवा था. उस का अस्तित्व क्षणिक था. वह क्षणभंगुर था. शब्द को लंबा जीवन देने के लिए कंठस्थ कर के, याद कर के, वेदों को अमर रखने की कोशिश की गई थी. वेदों को कंठस्थ करने वाले वेदी, द्विवेदी, त्रिवेदी और चतुर्वेदी ब्राह्मणों की पूरी जातियाँ बन गईं जो अपना अपना वेद पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखती थीं. इसी प्रकार क़ुरान को याद रखने वाले हाफ़िज कहलाते थे.

शब्द को याददाश्त की सीमाओं से बाहर निकाल कर सर्वव्यापक करने के लिए, लंबा जीवन देने के लिए, लिपियाँ बनीं. लिपियों में अंकित हो कर शब्द साकार मूर्ति बन गया. वह ताड़पत्रों पर, पत्थरों पर, अंकित किया जाने लगा. काग़ज़ आया तो शब्द लिखना और भी आसान, सस्ता हो कर टिकाऊ हो गया. लिपि ने शब्द को स्थायित्व दिया. काल और देश की सीमाओं से बाहर निकल कर व्यापक हो गया. अब वह एक से दूसरे देश और एक से दूसरी पीढ़ी तक आसानी से जा सकता था. मुद्रण कला के आविष्कार से मानव के ज्ञान में विस्तार के महाद्वार खुल गए. और अब इंटरनैट सूचना का महापथ और ज्ञान विज्ञान का अप्रतिम भंडार बन गया है. बिजली की गति से हम अपनी बात सात समंदर पार तत्काल पहुँचाते हैं.

हमारा संबंध केवल वाचिक और लिखित शब्द मात्र से हैलिपि कोई भी हो, भाषा कोई भी हो, हिंदी हो, अँगरेजी हो, या चीनी... एक लिपि में कई भाषाएँ लिखी जा सकती हैं, जैसे देवनागरी में हिंदी और मराठी, और नेपाली... हिंदी के लिए मुंडी जैसी पुरानी कई लिपियाँ थीं... हिंदी के कई काव्य ग्रंथ उर्दू लिपि में लिखे गए. आज उर्दू कविताएँ देवनागरी में छपती और ख़ूब बिकती हैं. रोमन लिपि में यूरोप की अधिकांश भाषाएँ लिखी जाती हैं. रोमन में हिंदी भी लिखी जाती है. ब्रिटिश काल में सैनिकों को रोमन हिंदी सिखाई जाती थी. आज इंटरनैट पर कई लोग हिंदी पत्रव्यवहार रोमन लिपि में ही करते हैं. रोमन में आजकल संसार की कई अन्य भाषाएँ लिखने के कई विकल्प मिलते हैं...

चीनी जापानी या प्राचीन मिस्री भाषाएँ चित्रों में लिखी जाती हैं. चित्रों में लिखी लिपि का आधुनिकतम रूप शार्टहैंड कहा जा सकता है. चित्र लिपियो में अक्षरों का होना आवश्यक नहीं है. हाँ, जो बात सब भाषाओं और लिपियों में कामन है, एक सी है, समान है, वह है शब्द. हर भाषा शब्दों में बात करती है. शब्द लिखती. सुनती और पढ़ती है.

हर भाषा का अपना एक कोड होता है. इसी लिए संस्कृत में भाषा को व्याकृता वाणी कहा गया है, नियमों से बनी और नियमों से बँधी सुव्यवस्थित क्रमबद्ध बोली. शुरू में यह कोड लिखा नहीं गया था. सब मन ही मन यह कोड जानते थे. पढ़ें या नहीं फिर भी हम सब यह कोड जानते हैं. यह कोड किसी भी समाज के सदस्यों के बीच एक तरह का अलिखित अनुबंध है. लिखना पढ़ना सीखने से पहले बच्चा यह कोड समझ चुका होता है.

भाषा और कोड निरंतर नवीकरण की प्रक्रिया में रहते है...

पहले आम आदमी भाषा बनाता है, बाद में विद्वान मग़ज़ खपा कर उस के कोड बनाते हैं. फिर आम आदमी उन कोडों को तोड़ता हुआ नए शब्द बनाता रहता है, शब्दों का रूप और अर्थ बदलता रहता है. कोडों की सीमाएँ लाँघती, बाढ़ में आई नदी की तरह किनारे तोड़ती भाषाएँ नई धाराएँ बना लेती हैं. पहले विद्वान माथा पीटते हैं, इस प्रवृत्ति को उच्छृंखलता कहते हैं, भाषा का पतन कहते हैं, फिर बाद में नए कोड बनाने में जुट जाते हैं...

भाषाओं को विकारों से बचाने के लिए विद्वान व्याकरण बनाते हैं, शब्दकोश बनाते हैं. जानसन और वैब्स्टर जैसे कोशकारों ने लिखा है कि उन का उद्देश्य था इंग्लिश और अमरीकन इंग्लिश को स्थायी रूप देना, उसे बिगड़ने से बचाना. उन के कोश आधुनिक संसार के मानक कोश बने. लेकिन हुआ क्या? उन के देखते देखते भाषा बदल गई, नए शब्द आ गए. फिर कोशों के नए संस्करण बनने लगे. आजकल अँगरेजी के कोशों में हर साल हज़ारों नए शब्द डाले जाते हैं.

यही तो जीवित भाषाओं का गुण है... ख़ुशी की बात है कि हमारी हिंदी भी नए शब्द बनाने और ज़रूरी शब्द बाहर से लेने में किसी से पीछे नहीं रही है. अंतर केवल इतना है कि हमारे यहाँ अभी तक कोशों में नए शब्द हर साल डालने के प्रथा नहीं चली है.

Wednesday, October 31, 2007

जब नायक नायिका... और आगे

भाई विनय ने जो प्रश्न मुझ से किए, उन के उत्तर नीचे हैं

इस विषय पर सामूहिक चर्चा होनी चाहिए. चर्चा आरंभ करने के लिए मैं शीघ्र ही लंबा लेख लिखने वाला हूँ. वह अपने ब्लाग पर मैं पब्लिश करूँगा.

हिंदी का उच्चारण पिछले दशकों में, कहें तो पिछली सदी में, तेजी से बदला है. वह संस्कृत के प्रभाव से भिन्न होता जा रहा है. संस्कृत में ए ऐ ओ औ संयुक्त ध्वनियाँ थीं। वहाँ दो स्वतंत्र स्वरों को लिखने कि आज़ादी नहीं थी। अ और इ हों तो ए ही लिखना होता था, अ और ई हों तो ऐ। अब हम लोग ए और ऐ को स्वतंत्र स्वर मानने लगे हैं जो अँगरेजी के मेट और मैट वाले ही हैं। यही बात ओ और औ के बारे में है. मराठी और हिंदी में इन अँगरेजी स्वरों के लिए नए चिह्न तो बना लिए गए हैं, लेकिन कोश में उन का क्रम क्या होगा--यह कहीं तय नहीं है.

मैं इस समस्या को लेखन और कोश की समस्या के तौर पर मिला कर देखता हूँ। नए स्वरों को लिखना और टाइप करना तो एक नई समस्या है ही (हम पाट्य़ कर्म में इन के बारे में नहीं सिखाते. पाठ्य क्रम में हम क़ ख़ आदि के बारे में, ड़ और ढ़ के बारे में नहीं बताते. वहाँ तो हम बारह खड़ी सिखाते हैं अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ ए ऐ ओ औ अं अः. लेकिन कोशक्रम में होता है अं अः अ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ ओ औ... इसी तरह क्ष त्र ज्ञ सब से अंत में बताए जाते हैं. बच्चे समझते हैं कि ये तीन अक्षर ह के भी बाद में आते होंगे. जब बच्चा कोश देखता है तो समझ नहीं पाता कि मैं कौन सा शब्द कहाँ खोजूँ। अब हम अइ अई अउ अऊ लिख सकते हैं, लिखते हैं. सुअवसर शब्द संस्कृत में हो ही नहीं सकता. वहाँ होता स्ववसर. ये सब देखते हुए, यह बात स्वीकार करते हुए कि सारे संसार तो क्या, सारे भारत की सभी ध्वनियाँ हमारी देवनागरी में नहीं समोई जा सकतीं, हमें प्रचलित स्वरों के ज़रिए निकटतम राह अपनानी चाहिए. आप स्वयं देखिए--आज हिंदी में क्या हो रहा है? मेट मैट टेस्ट टैस्ट मेच मैच आदि के हिज्जे एक से ही लिखे जा रहे हैं. देखिए-- टेस्ट मेच देखने का असली टेस्ट तो मैदान में ही आता है... जब वी मेट तो आप देख ही चुके हैं... शेष कभी फिर...

ब्लाग की दुनिया में मैं नया हूँ--निपट अनाड़ी... आप जैसे लोगों से सीख कर ही आगे बढ़ूँगा। मुझे तो अभी लेआउट बनाना, चित्र डालना भी नहीं आता। और यह भी नहीं जानता की प्रमुख साइटों पर अपना ब्लाग रजिस्टर कैसे करूँ। क्या आप उसे हर जगह रजिस्टर करा सकते हैं? ब्लाग का नाम है--Arvind's Koshnama अरविंद कोशनामा। आप खोजेंगे तो मिल जाएगा।

एक बार फिर सभी से अनुरोध है कि इस चर्चा को इस ब्लाग पर आगे बढ़ाएँ और सभी मित्रों को इस चर्चा के बारे में बताएँ, और यह ब्लाग देखने को प्रेरित करें।

शीघ्र ही मैं कुछ अन्य गंभीर विषय भी उठाने वाला हूँ...

अरविंद

Monday, October 29, 2007

जब नायक नायिका मिले? या साथ सोए?

अँगरेजी का यूसेज तेज़ी से बढ़ रहा है,
लेकिन सवाल है अँगरेजी शब्द देवनागरी में लिखें कैसे. . .

बदलती हिंदी में विदेशी, विशेषकर अँगरेजी, शब्दों का यूसेज या प्रचलन तेज़ी से बढ़ रहा है. उन्हें देवनागरी में सही लिखने में कई समस्याएँ आती है.

हम हर ध्वनि को वैसा ही बोलना चाहते हैं जैसा लिखते हैं, और जैसा बोलते हैं वैसा ही लिखना चाहते हैं. लेकिन रोमन लिपि में लिखना पढ़ना हमारी देवनागरी जैसा नहीं है. उस में ए से ज़ैड तक कुल 26 अक्षर हैं---और उन के ज़रिए सभी उच्चारण लिखने होते हैं. उदाहरण के लिए 'सी' (c) को 'स' बोलना है या 'क', यह दर्शाने के लिए उस के बाद कोई भिन्न स्वर या वर्ण लगाने की प्रथा बनी है. मोटे तौर पर 'सी' के बाद 'आई' (i) है या 'ई' (e) या 'ऐस' (s), या पहले 'सी' (c) है तो उच्चारण है 'स', बाद में 'ए' (a), 'यू' (u) है या 'ओ' (o) तो बोलते हैं 'क'. यही कारण है कि अँगरेजों को भी अंगरेजी हिज्जे रटने पड़ते हैं.
अँगरेजी में स्वरों की संख्या तो कुल पाँच हैं, लेकिन हमारे 10 स्वर उच्चारणों की जगह (अँ अः को नहीं गिना गया है, न ही ऋ ऋ़ लृ को) अँगरेजी में कम से कम 14 हैं. स्पष्ट है कि देवनागरी में पुराने स्वरो और मात्राओं से वे नहीं लिखे जा सकते. उन के लिए हमें अपने नियम बदलने पड़ेंगे, या नए अक्षर गढ़ने पड़ेंगे, जैसे आ और औ के बीच में ऑ. सवाल उठता है कि उन्हें कोश क्रम में कहाँ रखा जाए?

यूरोप की भाषाओं में लिपि तो वही रोमन है, लेकिन अक्षरों का उच्चारण अलग है. दूसरे देशों के यूरोपियनों को या तो अँगरेजी उच्चारण सीखना होता है या हिज्जे. अनेक देवनागरी उच्चारण कई यूरोपीय देशों में हैं ही नहीं. अँगरेज या फ़्राँसीसी 'खादी' को 'कादी' बोलते हैं.

विदेशी नामों की बात तो दूर, रोमन में लिखे अपने भारतीय शब्द भी हम अपनी भाषाओं में सही नहीं लिख पाते. मेरे जन्म स्थान 'मेरठ Meerut' को मराठी में 'मीरुत' लिखा जाता है. बाँगला Saurav का सही उच्चारण है 'सौरभ' क्योंकि वहाँ 'व' का उच्चरण 'ब' या 'भ' है, लेकिन हिंदी में उसे 'सौरव' लिखने की प्रवृत्ति है. आम तौर पर हृषिकेश या हृतिक को हिंदी वाले ऋषिकेश या ऋतिक लिखते हैं. उड़िया 'शात्कड़ी Satkari' को हिंदी में लोग 'सत्कारी' बोलते लिखते हैं.


सेंटर सैंटर... टेस्ट टैस्ट... वेस्ट वैस्ट...

आज हिंदी में हर ओर विदेशी शब्दों और नामों की रेज़ है. अँगरेजी में कहें तो rage रेज है. देवनागरी में उन के हिज्जे कई बार भ्रामक हो जाते हैं. मैं कुछ वे शब्द ले रहा हूँ जिन में ए या ऐ उच्चारणों का घपला है. जैसे पीएमओ (प्रधान मंत्री कार्यालय)... होना चाहिए पीऐमओ. इस के सैकड़ों उदाहरण पता नहीं कब से हिंदी पत्रपत्रिकाओं में मिलते रहे हैं...
बात शुरू होती है रोमन लिपि के f, h, l, m, n, x अक्षरों के उच्चारणों की हमारी लिखावट से. हम लिखते हैं-- एफ़, एच, एल, एम, एन, एक्स... जो सही है और होना चाहिए वह है ऐफ़, ऐच, ऐल, ऐम, ऐन, ऐक्स. भयंकर परिणाम होता है...
अभी हाल में मेट और मैट का भयानक प्रयोग देखने में आया नई फ़िल्म जब वी मेट के नाम में. हिंदी में नाम लिखने वाला कहना चाहता था जब नायक नायिका मिले यानी जब वी मैट. लेकिन जो उस ने लिखा उस का मतलब होता है जब नायक और नायिका ने परस्पर शरीरिक संबंध संपन्न किया.

कुछ अन्य उदाहरण...

taste टेस्ट, test टेस्ट (होना चाहिए टैस्ट). अगर यह लिखते रहना है तो यह वाक्य कैसे लगेंगे? फ़ूड के टेस्ट का असली टेस्ट तो खाने में है. टेस्ट मेच को देखने का पूरा टेस्ट को स्टेडियम में ही आता है.
rate रेट, rat रेट. यदि rat (चूहा) है तो भी लिखते हैं रेट, (होना चाहिए रैट), rattle (झुनझुना) रेटल (चाहिए रैटल), mate मेट, met मेट (होना चाहिए मैट) की बात तो ऊपरहो ही चुकी है. metro को लिखते हैं मेट्रो (होना चाहिए मैट्रो), sale सेल, sell सेल (होना चाहिए सैल).

इसी तर्ज़ पर हाल ही मैं ने एक सुप्रसिद्ध हिंदी दैनिक में पढ़ा-- बेस्ट सेलर. हँसी भी आई और दया भी-- बैस्ट सैलर (बहुत बिकने वाली पुस्तक) का कैसा विद्रूप!

लीजिए और भी उदाहरण...
bale को भी बेल, bell को भी बेल (होना चाहिए बैल), hale को हेल, hell को भी हेल (होना चाहिए हैल), health को हेल्थ (होना चाहिए हैल्थ), help को हेल्प (होना चाहिए हैल्प), इसी तर्ज़ पर help line हेल्प लाइन (होना चाहिए हैल्प लाइन), take को टेक, tech को भी टेक (होना चाहिए टैक), इसी तरह hitech हाइटेक (सही होता है हाईटैक).

कुछ अन्य सही उच्चारण जो होने चाहिए, पर होते नहीं... democracy डैमोक्रेसी, leather लैदर, metal मैटल, mettalic मैटलिक, centre सैंटर... cattle कैटल...

सवाल है कब तक?

जब नायक नायिका मिले? या साथ सोए?

सवाल है अँगरेजी का यूसेज तेज़ी से बढ़ रहा है, लेकिन अँगरेजी शब्द देवनागरी में कैसे लिखें...
बदलती हिंदी में विदेशी, विशेषकर अँगरेजी, शब्दों का यूसेज या प्रचलन तेज़ी से बढ़ रहा है. उन्हें देवनागरी में सही लिखने में कई समस्याएँ आती है.
हम हर ध्वनि को वैसा ही बोलना चाहते हैं जैसा लिखते हैं, और जैसा बोलते हैं वैसा ही लिखना चाहते हैं. लेकिन रोमन लिपि में लिखना पढ़ना हमारी देवनागरी जैसा नहीं है. उस में ए से ज़ैड तक कुल 26 अक्षर हैं---और उन के ज़रिए सभी उच्चारण लिखने होते हैं. उदाहरण के लिए 'सी' (c) को 'स' बोलना है या 'क', यह दर्शाने के लिए उस के बाद कोई भिन्न स्वर या वर्ण लगाने की प्रथा बनी है. मोटे तौर पर 'सी' के बाद 'आई' (i) है या 'ई' (e) या 'ऐस' (s), या पहले 'सी' (c) है तो उच्चारण है 'स', बाद में 'ए' (a), 'यू' (u) है या 'ओ' (o) तो बोलते हैं 'क'. यही कारण है कि अँगरेजों को भी अंगरेजी हिज्जे रटने पड़ते हैं.
अँगरेजी में स्वरों की संख्या तो कुल पाँच हैं, लेकिन हमारे 10 स्वर उच्चारणों की जगह (अँ अः को नहीं गिना गया है, न ही ऋ ऋ़ लृ को) अँगरेजी में कम से कम 14 हैं. स्पष्ट है कि देवनागरी में पुराने स्वरो और मात्राओं से वे नहीं लिखे जा सकते. उन के लिए हमें अपने नियम बदलने पड़ेंगे, या नए अक्षर गढ़ने पड़ेंगे, जैसे आ और औ के बीच में ऑ. सवाल उठता है कि उन्हें कोश क्रम में कहाँ रखा जाए?
यूरोप की भाषाओं में लिपि तो वही रोमन है, लेकिन अक्षरों का उच्चारण अलग है. दूसरे देशों के यूरोपियनों को या तो अँगरेजी उच्चारण सीखना होता है या हिज्जे. अनेक देवनागरी उच्चारण कई यूरोपीय देशों में हैं ही नहीं. अँगरेज या फ़्राँसीसी 'खादी' को 'कादी' बोलते हैं. विदेशी नामों की बात तो दूर, रोमन में लिखे अपने भारतीय शब्द भी हम अपनी भाषाओं में सही नहीं लिख पाते. मेरे जन्म स्थान 'मेरठ Meerut' को मराठी में 'मीरुत' लिखा जाता है. बाँगला Saurav का सही उच्चारण है 'सौरभ' क्योंकि वहाँ 'व' का उच्चरण 'ब' या 'भ' है, लेकिन हिंदी में उसे 'सौरव' लिखने की प्रवृत्ति है. आम तौर पर हृषिकेश या हृतिक को हिंदी वाले ऋषिकेश या ऋतिक लिखते हैं. उड़िया 'शात्कड़ी Satkari' को हिंदी में लोग 'सत्कारी' बोलते लिखते हैं.
सेंटर सैंटर... टेस्ट टैस्ट... वेस्ट वैस्ट...
आज हिंदी में हर ओर विदेशी शब्दों और नामों की रेज़ है. अँगरेजी में कहें तो rage रेज है. देवनागरी में उन के हिज्जे कई बार भ्रामक हो जाते हैं. मैं कुछ वे शब्द ले रहा हूँ जिन में ए या ऐ उच्चारणों का घपला है. जैसे पीएमओ (प्रधान मंत्री कार्यालय)... होना चाहिए पीऐमओ. इस के सैकड़ों उदाहरण पता नहीं कब से हिंदी पत्रपत्रिकाओं में मिलते रहे हैं...
बात शुरू होती है रोमन लिपि के f, h, l, m, n, x अक्षरों के उच्चारणों की हमारी लिखावट से. हम लिखते हैं-- एफ़, एच, एल, एम, एन, एक्स... जो सही है और होना चाहिए वह है ऐफ़, ऐच, ऐल, ऐम, ऐन, ऐक्स. भयंकर परिणाम होता है...
अभी हाल में मेट और मैट का भयानक प्रयोग देखने में आया नई फ़िल्म जब वी मेट के नाम में. जैसे नाम लिखा गया है नाम लिखने वाला कहना चाहता था जब नायक नायिका मिले यानी जब वी मैट. लेकिन जो उस ने लिखा उस का मतलब होता है कि नायक और नायिका ने परस्पर शरीरिक संबंध कैसे संपन्न किया.
कुछ अन्य उदाहरण...
taste टेस्ट, test टेस्ट (होना चाहिए टैस्ट). अगर यह लिखते रहना है तो यह वाक्य कैसे लगेंगे? फ़ूड के टेस्ट का असली टेस्ट तो खाने में है. टेस्ट मेच को देखने का पूरा टेस्ट को स्टेडियम में ही आता है.
rate रेट, rat रेट. यदि rat (चूहा) है तो भी लिखते हैं रेट, (होना चाहिए रैट), rattle (झुनझुना) रेटल (चाहिए रैटल), mate मेट, met मेट (होना चाहिए मैट) की बात तो ऊपरहो ही चुकी है. metro को लिखते हैं मेट्रो (होना चाहिए मैट्रो), sale सेल, sell सेल (होना चाहिए सैल).
इसी तर्ज़ पर हाल ही मैं ने एक सुप्रसिद्ध हिंदी दैनिक में पढ़ा-- बेस्ट सेलर. हँसी भी आई और दया भी-- बैस्ट सैलर (बहुत बिकने वाली पुस्तक) का कैसा विद्रूप!
कुछ अन्य उदाहरण...bale को भी बेल, bell को भी बेल (होना चाहिए बैल), hale को हेल, hell को भी हेल (होना चाहिए हैल), health को हेल्थ (होना चाहिए हैल्थ), help को हेल्प (होना चाहिए हैल्प), इसी तर्ज़ पर help line हेल्प लाइन (होना चाहिए हैल्प लाइन), take को टेक, tech को भी टेक (होना चाहिए टैक), इसी तरह hitech हाइटेक (सही होता है हाईटैक).
कुछ अन्य सही उच्चारण जो होने चाहिए, पर होते नहीं... democracy डैमोक्रेसी, leather लैदर, metal मैटल, mettalic मैटलिक, centre सैंटर... cattle कैटल...

सवाल है कब तक?

Sunday, October 28, 2007

कैसे बने अरविंद कुमार दंपति का विशाल डाटाबेस और उन के कोश

भारत को पहला आधुनिक और संसार से टक्कर लेने वाला हिंदी थिसारस बनाने की लगन सन 1973 में अरविंद कुमार को ऐसी लगी कि टाइम्स आफ़ इंडिया (मुंबई) से प्रकाशित होने वाली उच्चस्तरीय औऱ लकप्रिय फ़िल्म पत्रिका माधुरी का संपादक पद त्याग कर 1978 मं दिल्ली चले आए और पहले कार्डों पर डाटा बनाना शुरू किया। इस में आरंभ से ही पत्नी कुसुम पूरी तरह उन के साथ थीं और सहयोगिनी बनी।

उन के पास भारत के लिए आधुनिक थिसारस बनाने के लिए कोई उपयुक्त माडल नहीं था। रोजट का थिसारस देश की संस्कृति को लक्षित करने के लिए बेहद अनुपयुक्त पाया गया। और उस के नए औऱ सुविशाल अंतरराष्ट्रीय संस्करण भी एशियाई संस्कृतियों से नाख़बर थे। पुराने अमर कोश का माडल आज के ज़माने में काम नहीं करता था। सब से पहले तो उस में जो ज्ञान संकलित था वह 1,500 साल पुराना था। दूसरे उस के सामाजिक संदर्भ दूसरे थे। वर्गों का विभाजन वरण व्यवस्था के अनुरूप किया गया था। स्वर्ग प्रकरण में देवी देवताओं की सूची नाकाफ़ी थी। संगीत अगर नैसर्गिक काररवाई था, तो संगीतकारों कलाकारों की गिनती शूद्रों मे थी। गायों को पशुओं में नहीं रखा था, बल्कि वैश्य वर्ग में थीं। ब्राह्मण वर्ग में न हो कर पुरोहित क्षत्रिय वर्ग में थे क्यों कि वे राजाओं के पुरोहित होते थे।

अतः दंपति को अपना बिल्कुल अलग और नया माडल अपनेआप बनाना था। यह कोई आसान नहीं था। उन्हों ने शब्दों के संकलन का काम नहीं रोका। कार्डों को वे अलग अलग ट्रेओं में रखते गए। हर ट्रे के विषय और उपविषय अलग रखे गए। ट्रेओँ का क्रम बदलने मात्र से माडल हर सप्ताह बदल जाता था। पहला मनपसंद माडल बनने में 14 साल लगे। तब तक पूरे कमरे में कई मेज़ों और रैकों में लगीं बीसियों ट्रेओं में 60,000 से ऊपर कार्डों में 2,50.000 से ऊपर शब्द और अभिव्यक्तियाँ लिखी जा चुकी थी। काम इतना बढ़ गया थी कि याद रखना मुश्किल हो गया था कि किन विषयों पर कार्ड समूह पहले ही बन चुके हैं।

अब तक उन का बेटा सुमीत ऐमबीबीऐस और ऐमडी (सर्जरी) कर चुका था और दिल्ली के राममनोगदर लोहिया अस्पताल में रैज़िडेंट सर्जन था। वहाँ कंप्यूटरन की प्रक्रिया चल रही थी। सुमीत को लगा कि सप्ताह के सातों दिन पूरा टाइम लगे रहने पर भी हमारा काम कंप्यूटर के बग़ैर कई दशकों में भी पूरा नही हो पाएगा। उस का कहना था कि कंप्यूटर पर डाटाबेस बनाना ही होगा। इतने संसाधन नहीं थे कि कंप्यूटर और महँगे प्रोग्राम ख़रीद सकें या प्रोग्रामर रख सकें। इस का इलाज़ सुमीत ने ही निकाला। वह ईरान की सरकारी तेल कंपनी में सर्जन का काम करने गया औऱ कामचलाऊ बचत होते ही लौट आया। पहला काम किया कंप्यूटर ख़रीदने का, दूसरा किया बग़ैर कोई संस्थान जाइन किए प्रोग्रामिंग सीखने का। शीघ्र ही उस ने फ़ौक्सप्रो FoxPro पर काम करने के लिए थिसारस लायक़ प्रोग्राम लिखा, धीरे धीरे आवश्यकतानुसार उस का विकास करता गया। यहाँ तक कि वह प्रोग्रामिंग में विशेषज्ञ बन गया, और बाद में तो सिंगापुरी की एक कंपनी में सीनियर वाइस प्रैज़िडेंट बन कर अस्पतालों को चलाने का जो प्रोग्राम बनाया वह दक्षिण पूर्व एशिया के कई अस्पतालों में सफलतापूर्वक चल रहा है।

अरविंद दंपति ने पहले 5,00,000 रिकार्डों का हिंदी डाटा बनाया था। उस में से चुने 1,100 शीर्षकों 23,759 उपशीर्षकों में 1,60,850 रिकार्ड वाले समांतर कोश हिंदी थिसारस का प्रकाशन दिसंबर 1996 में नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया ने स्वाधीनता की आगामी स्वर्ण जयंती के लिए विशेष उपहोर के तौर पर किया। पहली प्रति तत्कालीन राष्ट्रपति डा शंकरदयाल शर्मा ने राष्ट्रपति भवन में विशेष समारोह में स्वीकार की। लोगों ने इसे हाथो हाथ लिया। हर तरफ़ इस का स्वागत हुआ प्रशंसा मिली। इसे हिंदी के माथे पर सुनहरी बिंदी, सदी की सर्वश्रेष्ठ पुस्तक, जैसे विशेषणों से अलंकृत किया गया। पुस्तक के लिए कोश के प्रणेता अरविंद कुमार को अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

समांतर कोश के प्रकाशित होते ही अरविंद दंपति अपने डाटा में से और भी कठिन चयन कर के डाटा को अँगरेजी शब्द और मुहावरे डाल कर द्विभाषी बनाने लगे। बाद में 2007 तक अनथक और अनवरत लगन में रत अरविंद दंपति से हिंदी इंग्लिश के दस लाख से भी ऊपर शब्दों और अभिव्यक्तियो के विशाल डाटा बेस बनाया। उन के पास

कुल संकलित डाटा में से चुने गए केवल काम के रिकार्डों से जैनेरेट की गई संसार की अद्वितीय थिसारस और दो डिक्शनरियाँ है। संभवतः यह संसार में अपनी तरह का सब से विशाल सुसमृद्ध द्विभाषी थिसारस है। आम तौर पर ऐसे थिसारस कुल मिला कर 300-350 पेजों के होते हैं, और उन का मुख्य उद्देश्य दोनों भाषाओं के प्रारंभिक छात्रों भाषा सिखाना होता है--जैसे द कैंब्रिज फ़ैंच-इंग्लिश थिसारस (कैंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रैस, 1998)। इस के लिए दावा किया गया है कि संसार में यह अपनी तरह का पहला द्विभाषी थिसारस है। इस में कुल मिला कर 326 पेज हैं। इन में से थिसारस के लिए बड़े टाइप में 240 पेज हैं। जिस के अंतिम 10 पेजों में दोनों भाषाओँ के क्रिया रूप दरशाए गए हैं। शेष भाग में दोनों भाषाओं में इंडैक्स हैं।