
शब्द संकलन
शब्दों के संकलन और कोश निर्माण की बात करें तो—
सभ्यता और संस्कृति के उदय से ही आदमी जान गया था कि भाव के सही संप्रेषण के लिए सही अभिव्यक्ति आवश्यक है. सही अभिव्यक्ति के लिए सही शब्द का चयन आवश्यक है. सही शब्द के चयन के लिए शब्दों के संकलन आवश्यक हैं. शब्दों और भाषा के मानकीकरण की आवश्यकता समझ कर आरंभिक लिपियों के उदय से बहुत पहले ही आदमी ने शब्दों का लेखाजोखा रखना शुरू कर दिया था. इस के लिए उस ने कोश बनाना शुरू किया. कोश मेंबने. हमारी यह शानदार परंपरा वेदों जितनी—कम से कम पाँच हज़ार साल—पुरानी है. प्रजापति कश्यप का निघंटु संसार का प्राचीनतम शब्द संकलन है. इस में 18 सौ वैदिक शब्दों को इकट्ठा किया गया है. निघंटु पर महर्षि यास्क की व्याख्या निरुक्त संसार का पहला शब्दार्थ कोश और विश्वकोश यानी ऐनसाइक्लोपीडिया है! इस महान शृंखला की सशक्त कड़ी है छठी या सातवीं सदी में लिखा अमर सिंह कृत नामलिंगानुशासन या त्रिकांड जिसे सारा संसार अमर कोश के नाम से जानता है.
भारत के बाहर संसार में शब्द संकलन का एक प्राचीन प्रयास अक्कादियाई संस्कृति की शब्द सूची है. यह शायद ईसा पूर्व सातवीं सदी की रचना है. ईसा से तीसरी सदी पहले की चीनी भाषा का कोश है ईर्या.
आधुनिक कोशों की नीवँ डाली इंग्लैंड में 1755 में सैमुएल जानसन ने. उन की डिक्शनरी आफ़ इंग्लिश लैंग्वेज (Samuel Johnson's Dictionary of the English Language) ने कोशकारिता को नए आयाम दिए. इस में परिभाषाएँ भी दी गई थीं.
असली आधुनिक कोश आया इक्यावन साल बाद 1806. अमरीका में नोहा वैब्स्टर की ए कंपैंडियस डिक्शनरी आफ़ इंग्लिश लैंग्वेज (Noah Webster's A Compendious Dictionary of the English Language) प्रकाशित हुई. इस ने जो स्तर स्थापित किया वह पहले कभी नहीं हुआ था. साहित्यिक शब्दावली के साथ साथ कला और विज्ञान क्षेत्रों को स्थान दिया गया था. कोश को सफल होना ही था, हुआ. वैब्स्टर के बाद अँगरेजी कोशों के रिवीज़न और नए कोशों के प्रकाशन का व्यवसाय तेज़ी से बढ़ने लगा. आज छोटे बड़े हर शहर में, विदेशों में तो हर गाँव में, किताबों की दुकानें हैं. हर दुकान पर कई कोश मिलते हैं. हर साल कोशों में नए शब्द शामिल किए जाते हैं.
अपने कोशों के लिए वैब्स्टर ने 20 भाषाएँ सीखीं ताकि वह अँगरेजी शब्दों के उद्गम तक जा सकें. आप को जान कर आश्चर्य होगा और प्रसन्नता भी कि उन भाषाओं में एक संस्कृत भी थी. तभी उस कोश में अनेक अँगरेजी शब्दों का संस्कृत उद्गम तक वर्णित है. मैं पिछले तीस सालों से वैब्स्टर कोश का न्यू कालिजिएट संस्करण काम में ला रहा हूँ. मुझे इस में मेरे काम की हर ज़रूरी सामग्री मिल जाती है. यहाँ तक कि भारोपीय मूल वाले अँगरेजी शब्दों के संस्कृत स्रोत भी. समांतर कोश के द्विभाषी संस्करण द पेंगुइन इग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी पर काम करते करते कई बार तो अनपेक्षित जगहों पर भी शब्दों के संस्कृत मूल मिल गए. पता चला कि ईक्विवैलेंट, बाईवैलेंट जैसे शब्दों के मूल में है संस्कृत का वलयन. एअर यानी हवा का मूल संस्कृत ईर में है, सोनिक के मूल में हैं संस्कृत के स्वन और स्वानिक. कई बार मैं सोचता था—काश, डाक्टर रघुवीर की टीम ने और बाद में तकनीकी शब्दावली बनाने वाले सरकारी संस्थानों ने ये संस्कृत मूल जानने की कोशिश की होती! उन के बनाए शब्दों को एक भारतीय आधार मिल जाता और लोकप्रियता सहज हो जाती. ख़ैर, उन लोगों ने जो किया वह भी भागीरथ प्रयास था...
कोश कई तरह के होते हैं. किसी भाषा के एकल कोश, जैसे ऊपर लिखे अँगरेजी कोश या हिंदी से हिंदी के कोश. इन में एक भाषा के शब्दों के अर्थ उसी भाषा में समझाए जाते हैं. कोश द्विभाषी भी होते हैं. जैसे संस्कृत से अँगरेजी के कोश. सन 1872 में छपी सर मोनिअर मोनिअर-विलियम्स की (बारीक़ टाइप में 8.5"x11.75" आकार के तीन कालम वाले एक हज़ार तीन सौ तैंतीस पृष्ठों की अद्वितीय संस्कृत-इंग्लिश डिक्शनरी इस का अनुपम उदाहरण है. या आजकल बाज़ार में मिलने वाले ढेर सारे अँगेरेजी-हिंदी कोश और हिंदी-अँगरेजी कोश. इन का उद्देश्य होता है एक भाषा जानने वाले को दूसरी भाषा के शब्दों का ज्ञान देना. जिस को जिस भाषा में पारंगत होना होता है या उस के शब्दों को समझने की ज़रूरत होती है, वह उसी भाषा के कोशों का उपयोग करता है.
कोशों के पीछे सामाजिक और राजनीतिक उद्देश्य भी होते हैं.
मोनिअर-विलियम्स के ज़माने में अँगरेज भारत पर राज करने के लिए हमारी संस्कृति और भाषाओं को पूरी तरह समझना चाहते थे, इस लिए उन्हों ने ऐसे कई कोश बनवाए. आज हम अँगरेजी सीख कर सारे संसार का ज्ञान पाना चाहते हैं तो हम अँगरेजी से हिंदी के कोश बना रहे हैं. हमारे समांतर कोश और उस के बाद के हमारे ही अन्य कोश भी हमारे दैश की इसी इच्छा आकांक्षा के प्रतीक हैं, प्रयास हैं.
(क्रमशः)